Sunday, August 23, 2009

मासूम मोहब्बत का बस इतना फ़साना है


मासूम मोहब्बत का बस इतना फ़साना है,
कागज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है ।
क्या शर्त -ऐ -मोहब्बत है क्या शर्त -ऐ -ज़माना है,
आवाज़ भी ज़ख्मी है और गीत भी गाना है ।
उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है ,
कस्ती भी पूरानी है , तूफ़ान को भी आना है ।
समझे या न समझे वो अंदाज़ मोहब्बत के ,
एक शख्स को आँखों से एक शेर सुनना है ।
भोली सी अदा , कोई फिर इश्क की जिद पर है ,
फ़िर आग का दरिया है और डूब कर जाना है ...

4 comments:

Unknown said...

Panktiya aacahi h....

Journalist said...

फ़िर आग का दरिया है और डूब कर जाना है ...

wah. achhi lagi rachna. vinod ji k.v. jhunjhunu ke student ho?

शिवरायण कुमार विनोद said...

रचना मौलिक नहीं है कहीं से चुराई गई है !
इस लिए बधाई के पात्र भी हम नहीं है !

Unknown said...

शायरा अना देहलवी😍